Kamal Ke Sur

Mughal-e-Azam से लेकर Pakeezah तक: पुराने बॉलीवुड गानों में Indian Classical Ragas का इस्तेमाल और उनका असर

mughal-e-azam to pakeezah kamal ke sur

भारतीय हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की जब भी बात होती है, तो ‘मुग़ल-ए-आज़म’ (1960) और ‘पाकीज़ा’ (1972) जैसी ऐतिहासिक फ़िल्मों का नाम सबसे पहले ज़ेहन में आता है। ये फ़िल्में केवल अपनी भव्यता या अभिनय के लिए ही नहीं जानी जातीं, बल्कि इनका संगीत भारतीय सिनेमा का एक ऐसा अनमोल धरोहर है जो कालजयी (Timeless) बन चुका है।

नौशाद साहब और गुलाम मोहम्मद साहब जैसे दिग्गज संगीतकारों ने उस दौर में सिनेमाई संगीत को भारतीय शास्त्रीय संगीत (Indian Classical Music) की नींव पर खड़ा किया था। रागों की शुद्धता और फ़िल्मी संगीत की सहजता का जो अद्भुत संगम इन फ़िल्मों में देखने को मिला, वह आज के आधुनिक दौर में दुर्लभ हो चुका है। आइए समझते हैं कि इन फ़िल्मों के गानों में किन प्रमुख रागों का इस्तेमाल हुआ था और उनका श्रोताओं पर क्या मनोवैज्ञानिक व भावनात्मक असर पड़ा।

मुग़ल-ए-आज़मऔर रागों की भव्यता (Music Architecture of Mughal-e-Azam)

संगीतकार नौशाद साहब भारतीय शास्त्रीय बंदिशों को फ़िल्मी पर्दे पर उतारने के सबसे बड़े उस्ताद थे। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के हर एक गीत में रागों का बहुत ही सटीक उपयोग किया गया था:

राग दरबारी कान्हड़ा – ‘प्यार किया तो डरना क्या’:

अनारकली की बगावत और बादशाह अकबर के दरबार की भव्यता को दर्शाने के लिए नौशाद जी ने राग दरबारी का चुनाव किया। राग दरबारी अपनी प्रकृति में बेहद गंभीर, शाही (Regal) और ओजस्वी माना जाता है। मंद्र सप्तक के भारी सुरों और गंभीर तानों ने इस गाने को एक ऐतिहासिक शाही आभा प्रदान की।

राग सोहनी – ‘प्रेम जोगन बन के’:

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब की रूहानी आवाज़ में गाया गया यह गाना राग सोहनी पर आधारित है। रात के अंतिम पहर का यह राग तड़प, विरह और अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति करता है, जिसने तानसेन की संगीत परंपरा को सीधे सिनेमाई पर्दे से जोड़ दिया।

राग केदार – ‘बेकस पे करम कीजिए’:

अनारकली की लाचारी और ईश्वर से प्रार्थना के भाव को व्यक्त करने के लिए राग केदार का सहारा लिया गया। राग केदार में शुद्ध मध्यम (म) और तीव्र मध्यम (मं) का जो सुंदर प्रयोग होता है, वह करुणा और भक्ति का अद्भुत भाव पैदा करता है।

‘पाकीज़ा’ और विरह का शास्त्रीय मिज़ाज (The Soulful Ragas of Pakeezah)

फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ का संगीत मुख्य रूप से गुलाम मोहम्मद साहब ने तैयार किया था (और उनके निधन के बाद बैकग्राउंड स्कोर व कुछ ट्रैक्स नौशाद साहब ने संभाले)। इस फ़िल्म का पूरा संगीत कोठे की संस्कृति, तन्हाई और एक तवायफ़ के पाकीज़ा (पवित्र) दिल की वेदना पर आधारित था:

राग पहाड़ी – ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा’:

लोकसंगीत और शास्त्रीय राग पहाड़ी का यह सुंदर मेल गाने को एक चंचल लेकिन सुरीला अंदाज़ देता है। पहाड़ी राग की प्रकृति सहज, सरल और तुरंत मन को मोह लेने वाली होती है।

राग यमन – ‘मौसम है आशिकाना’ व ‘थाड़े रहियो’:

शाम के समय गाया जाने वाला राग यमन (कल्याण ठाट) भक्ति और शृंगार रस का प्रतीक है। ‘थाड़े रहियो’ में राग यमन की कोमल तानें और तबले की विलंबित लय नर्तकी के इंतज़ार और उसकी नज़ाकत को पूरी शिद्दत से बयां करती हैं।

राग मालकौंस – ‘चलते चलते यूँ ही कोई मिल गया था’:

रात के सन्नाटे में यादों के कारवां को दर्शाने के लिए राग मालकौंस की गंभीर और ठहराव भरी धुनों का इस्तेमाल किया गया। मालकौंस का माइनर फील (कोमल ग, ध, नि) गाने में एक गहरा सन्नाटा और एहसास छोड़ जाता है।

शास्त्रीय रागों का श्रोताओं के मन पर असर (Emotional Impact of Ragas)

पुराने संगीतकार जानते थे कि किस समय और किस भावना के लिए कौन सा राग चुनना है। शास्त्रीय संगीत में हर राग का अपना एक समय (Time Theory of Ragas) और रस (Emotion) होता है:

समय चक्र का पालन: रात के दृश्यों के लिए रात के राग (जैसे यमन, मालकौंस, दरबारी) चुने जाते थे, जिससे दृश्य का प्रभाव दोगुना हो जाता था।

भावनात्मक संतुलन: रागों का सही प्रयोग सुनने वाले के मस्तिष्क में शांति, करुणा, प्रेम या उत्साह के हार्मोंस को सक्रिय करता है।

दीर्घकालिक अमरता: जो धुनें शास्त्रीय रागों पर आधारित होती हैं, वे कान को कभी थकाती नहीं हैं। यही कारण है कि 60-70 साल बीत जाने के बाद भी ये गाने आज के युवाओं को भी आकर्षित करते हैं।

‘मुग़ल-ए-आज़म’ और ‘पाकीज़ा’ जैसी फ़िल्में इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि जब तक संगीत में शास्त्रीय जड़ों (Classical Roots) की गहराई रहेगी, तब तक वह धुन अमर रहेगी। आज के नए इंडिपेंडेंट संगीतकारों के लिए भी इन क्लासिक कंपोज़िशन्स का अध्ययन करना एक महान पाठशाला के समान है।

कमाल के सुर (Kamal Ke Sur) पर हमारा निरंतर यही प्रयास है कि हम अपने पाठकों तक संगीत के इस समृद्ध इतिहास, शास्त्रीय बारीकियों और अनमोल ज्ञान की गंगा को निरंतर पहुँचाते रहें।

क्या आपको ‘मुग़ल-ए-आज़म’ या ‘पाकीज़ा’ का कोई ख़ास गाना सबसे ज़्यादा पसंद है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने पसंदीदा राग या गाने का नाम हमारे साथ ज़रूर साझा करें!

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top