आज की पीढ़ी भले ही हिप-हॉप, रैप और रीमिक्स गानों पर थिरकती हो, लेकिन जब मन की शांति, रूह के सुकून और सच्ची मेलोडी की बात आती है, तो हर पीढ़ी के कदम एक जगह आकर ठहर जाते हैं—वह है 1960 और 1970 का दशक। यह भारतीय सिनेमा और संगीत का वह ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) था, जिसकी चमक आज आधी सदी बीत जाने के बाद भी रत्ती भर कम नहीं हुई है।
आज के संगीत में जहां कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर का बोलबाला है, वहीं 60 और 70 के दशक में संगीत ‘दिल’ से निकलता था और सीधे ‘रूह’ में समा जाता था। आइए याद करते हैं संगीत के उन महान कलाकारों को, जिनकी बनाई धुनें आज भी हमारे जीवन का बैकग्राउंड स्कोर बनी हुई हैं।
नौशाद, ख़य्याम और मदन मोहन: सादगी और शास्त्रीय संगीत की त्रिमूर्तिः
इस दौर की शुरुआत संगीत में गहरी सादगी और भारतीय शास्त्रीय संगीत के अद्भुत तालमेल से हुई थी।
संगीत सम्राट नौशाद: नौशाद साहब ने लोक संगीत और शास्त्रीय रागों को सिनेमा के पर्दे पर इस तरह उतारा कि वह अमर हो गए। ‘मुग़ल-ए-आजम’ और ‘बैजू बावरा’ का संगीत इसका साक्षात प्रमाण है। कौन है जो इन गानों को भूल सकता है, “ओ दुनिया के रखवाले,” “मन तरपत हरि दर्शन को आज,” “प्यार किया तो डरना क्या”.
मदन मोहन (ग़ज़लों के शहंशाह): लता मंगेशकर जी की आवाज़ और मदन मोहन जी का संगीत जब मिलता था, तो इतिहास बनता था। उनके द्वारा संगीतबद्ध की गई ग़ज़लें और गीत, जैसे “लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो”, “आपकी नज़रों ने समझा” आज भी हर टूटे दिल का सहारा है।
ख़य्याम: मैलोडी के बादशाहः ख़य्याम साहब के संगीत में ठहराव और शायरी की गहरी समझ थी। ‘कभी कभी’ और ‘उमराव जान’ का संगीत उनके नाम को हमेशा के लिए अमर कर गया। ज़रा एक बार इस गाने पर नज़र डालिए. “इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं.” इसमें आशा जी का तो कोई जवाब ही नहीं है.
शंकर-जयकिशन और कल्याणजी-आनंदजी: भव्यता और लोक-धुनों के जादूगर –
शंकर-जयकिशन: राज कपूर की फिल्मों को अपनी धुनों से सजाने वाली इस जोड़ी ने भारतीय संगीत को भव्यता दी। 100 से अधिक म्यूजिशियंस के साथ ऑर्केस्ट्रा का जो इस्तेमाल इन्होंने किया, उसने संगीत को एक नया कैनवास दिया। “जीना यहाँ मरना यहाँ” जैसी धुनें आज भी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा सिखाती हैं।
कल्याणजी-आनंदजी: लोक संगीत (Folk) और आधुनिक बीट्स का इनका फ्यूजन कमाल का था। ‘डॉन’ के सस्पेंस म्यूजिक से लेकर ‘सफ़र’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के संजीदा गानों तक, इनका दायरा बहुत बड़ा था।
एस. डी. बर्मन और आर. डी. बर्मन: परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मिलन
पिता और पुत्र की इस जोड़ी ने भारतीय संगीत को दो अलग-अलग मगर बेमिसाल दिशाएं दीं।
एस. डी. बर्मन (सचिन देव बर्मन): बर्मन दादा के संगीत में त्रिपुरा और असम के लोक गीतों की सोंधी खुशबू थी। ‘गाइड’, ‘प्यासा’ और ‘आराधना’ जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी संगीत के छात्रों के लिए एक गाइड की तरह है।
आर. डी. बर्मन (पंचम दा): 70 का दशक आते-आते पंचम दा ने भारतीय संगीत में क्रांति ला दी। उन्होंने वेस्टर्न रॉक, जैज़ और लैटिन संगीत को भारतीय धुनों के साथ ऐसा मिलाया कि युवा दीवाने हो गए। “दम मारो दम” से लेकर “चुरा लिया है तुमने जो दिल को” तक, पंचम दा ने संगीत को एक नई ऊर्जा दी। ज़रा याद कीजिए “तीसरी मंज़िल” के गाने एक बार!
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, ओ. पी. नैयर और सलील चौधरी: विविधताओं का समंदर
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (L-P): लगभग तीन दशकों तक बॉलीवुड पर राज करने वाली इस जोड़ी ने भारतीय लोक संगीत (ढोलक और तबले के पैटर्न) को जो लोकप्रियता दिलाई, उसका कोई सानी नहीं है।
ओ. पी. नैयर: बिना लता जी के केवल आशा भोंसले और रफ़ी साहब की आवाज़ और अपनी जादुई ‘घोड़ा-गाड़ी’ की टाप जैसी रिदम (तांगे की थाप) से उन्होंने ऐसे ब्लॉकबस्टर गाने दिए जो आज भी पैर थिरकने पर मजबूर कर देते हैं।
सलील चौधरी और रवि: सलील दा ने वेस्टर्न क्लासिकल (सिम्फनी) को भारतीय धुनों में ढाला, वहीं संगीतकार रवि ने बेहद सरल और दिल को छू लेने वाली पारिवारिक और सामाजिक धुनों से हर घर में जगह बनाई। सलील जी का ये गीत, “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” और रवि जी का “चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों…” आजके संगीतकारों के लिए एक सबक है.
हर पीढ़ी का आखिरी ठिकानाः
60 और 70 का दशक सिर्फ गानों का नहीं, बल्कि महान गायकों (मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, मुकेश, लता मंगेशकर, और आशा भोंसले) और अमर गीतकारों (शैलेंद्र, साहिर लुध्यानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, आनंद बख्शी) के महासंगम का दौर था। यही वजह है कि आज की पीढ़ी चाहे जितना भी मॉडर्न संगीत सुन ले, जब उसे सुकून की तलाश होती है, तो वह वापस इसी ‘स्वर्ण युग’ की शरण में आती है।
‘कमाल के सुर’ (Kamal Ke Sur) की वैचारिक धरोहर:
हमारा मानना है कि 60 और 70 का दशक ही असली संगीत की पाठशाला है। हमारी वेबसाइट पर जो भी रिंगटोन्स और धुनें और हमारे YouTube के चैनल Kamal ke sur पर जो भी मधुर गाने तैयार किए जाते हैं, वो इसी सुनहरे दौर के दिग्गजों की विरासत से प्रेरित हैं। हम तकनीक का उपयोग अवश्य करते हैं, लेकिन संगीत की वो आत्मा, वो सादगी और वो ठहराव हमेशा ज़िंदा रखते हैं जो नौशाद साहब या पंचम दा ने हमें विरासत में दी है।